जयपुर के सुरबहार वादक अश्विन दलवी बने WZCC के निदेशक:घर पर बनाया 500 वाद्ययंत्रों का म्यूजियम, 19 हजार घंटे की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद

जयपुर के सुरबहार वादक अश्विन दलवी बने WZCC के निदेशक:घर पर बनाया 500 वाद्ययंत्रों का म्यूजियम, 19 हजार घंटे की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद


जयपुर-
के प्रसिद्ध संगीतकार और सुरबहार वादक डॉ. अश्विन दलवी को उदयपुर स्थित वेस्ट जोन कल्चरल सेंटर (WZCC) का नया निदेशक नियुक्त किया गया है। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े की स्वीकृति और संस्कृति मंत्रालय की पूर्वानुमति के बाद उन्हें तीन वर्ष के लिए इस पद पर संविदा नियुक्ति दी गई है।

डॉ. दलवी कला और संस्कृति जगत का जाना-पहचाना नाम हैं। वे वर्ष 2017-18 में राजस्थान ललित कला अकादमी के अध्यक्ष रह चुके हैं और कलाकारों के लिए कई नवाचारों के कारण चर्चा में रहे।

संगीत के क्षेत्र में उन्होंने एक सिद्धहस्त सितार और सुरबहार वादक के रूप में देश-विदेश में पहचान बनाई है। वे प्रसिद्ध तबला वादक महेश दलवी के पुत्र हैं, जिससे उन्हें बचपन से ही संगीत का वातावरण मिला।



घर में बनाया अनोखा संगीत म्यूजियम

डॉ. दलवी ने वर्ष 2010 में ‘नादसाधना इंस्टिट्यूट फॉर इंडियन म्यूजिक एंड रिसर्च सेंटर’ की स्थापना की। यहां उन्होंने गांव-देहातों से एकत्र किए गए 500 से अधिक वाद्ययंत्रों का म्यूजियम तैयार किया है।

इसके साथ ही यहां करीब 19 हजार घंटे की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग का विशाल संग्रह भी मौजूद है, जो देश-विदेश से आने वाले शोधार्थियों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।

रियाज और साधना से बनाई पहचान

डॉ. दलवी ने बताया कि उनकी शुरुआती शिक्षा विदेश में हुई, जबकि उच्च शिक्षा उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से सितार में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और पीएचडी के रूप में पूरी की।

संगीत के प्रति समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने रोजाना 10 से 12 घंटे तक रियाज कर अपनी कला को निखारा।



सुरबहार को बनाया जीवन का लक्ष्य

इटावा घराने के प्रसिद्ध सितार वादक पंडित अरविन्द पारीख से शिक्षा लेने के बाद उन्होंने सुरबहार को अपनाया। वर्ष 2008 में पहली बार सुरबहार बजाने के बाद उन्होंने इसे ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।

रुद्रवीणा का ‘भाई’ है सुरबहार

डॉ. दलवी के अनुसार, सुरबहार देखने में भले ही सितार जैसा लगे, लेकिन इसकी वादन शैली अलग होती है। इसे रुद्रवीणा का ‘भाई’ कहा जाता है और इसमें ध्रुपद शैली का गहरा प्रभाव होता है।

सुरबहार की धीमी, गंभीर और गूंजती ध्वनि इसे शास्त्रीय संगीत में एक खास स्थान दिलाती है।

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