यूजीसी के नए इक्विटी नियमों के विरोध में करणी सेना ने भेजा संवैधानिक प्रतिवेदन, नियम को बताया असंवैधानिक

यूजीसी के नए इक्विटी नियमों के विरोध में करणी सेना ने भेजा संवैधानिक प्रतिवेदन, नियम को बताया असंवैधानिक 

प्रेस विज्ञप्ति

प्रकाशनार्थ

पाली।
यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा “प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन” को 13 जनवरी 2026 से लागू किए जाने के विरोध में श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना, पाली संभाग अध्यक्ष प्रेमसिंह कुंपावत की ओर से भारत के सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एवं प्रख्यात अधिवक्ता डॉ. ए. पी. सिंह द्वारा एक विधिक एवं संवैधानिक प्रतिवेदन (लीगल कॉन्स्टीट्यूशनल रिप्रजेंटेशन) भेजा गया है।

यह प्रतिवेदन यूजीसी की चेयरपर्सन, महामहिम राष्ट्रपति, माननीय प्रधानमंत्री एवं माननीय केंद्रीय शिक्षा मंत्री को प्रेषित किया गया है।

प्रतिवेदन में कहा गया है कि यूजीसी द्वारा लागू किया गया यह नया नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) एवं अनुच्छेद 16 (समान अवसर का अधिकार) का खुला उल्लंघन है। डॉ. ए. पी. सिंह ने बताया कि यह विनियम कानून की तरह प्रभावी होता है, किंतु इसे संसद द्वारा पारित नहीं किया गया है, बल्कि एक अधिकृत संस्था द्वारा लागू किया गया है, जो संवैधानिक दृष्टि से गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

डॉ. सिंह ने इसे सवर्ण समाज के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण, एकतरफा एवं न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया है। उन्होंने कहा कि यह नियम सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को डिफॉल्ट अपराधी के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि झूठी जातिगत शिकायतों पर कोई ठोस दंडात्मक प्रावधान नहीं किया गया है।

उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रकार की झूठी शिकायतों के कारण अनेक छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों का भविष्य और करियर बर्बाद हो सकता है। वर्तमान में भी एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम एवं भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आती रही हैं, और यह नया नियम इन मामलों को और बढ़ावा देगा।

प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि यूजीसी ने सभी कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों को 90 दिनों के भीतर नई गाइडलाइंस लागू करने के निर्देश दिए हैं, जो शिक्षण संस्थानों में संतुलन एवं निष्पक्षता को समाप्त कर देगा। यह नियम भेदभाव समाप्त करने के बजाय उसे और अधिक बढ़ावा देगा।

डॉ. ए. पी. सिंह ने आशंका जताई कि इस निर्णय से देश के मेधावी छात्र बड़ी संख्या में विदेशों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पलायन करेंगे, जिससे ब्रेन ड्रेन और इकोनॉमिक ड्रेन जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न होंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि यह नियम प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों के विरुद्ध है, क्योंकि इसमें ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई संस्था स्वयं अपने ही मामले में निर्णयकर्ता बन सकती है, जो न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

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