जालोर की विरासत खतरे में: दुर्ग,
तोपखाना और छतरियों में बढ़ती जर्जरता, संरक्षण कार्य सुस्त
जालोर:
राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल जालोर दुर्ग, तोपखाना और भाद्राजून की छतरियां इन दिनों उपेक्षा का शिकार होते नजर आ रहे हैं। संरक्षण की जिम्मेदारी होने के बावजूद मरम्मत कार्य धीमी गति से चल रहा है, जिससे इन प्राचीन संरचनाओं को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।
दुर्ग की दीवारों पर कालिख और नाम लिखे जाने से इसकी ऐतिहासिक पहचान धूमिल हो रही है। कई स्थानों पर प्लास्टर झड़ चुका है और पत्थर टूटने लगे हैं। हैरानी की बात यह है कि कुछ हिस्सों में हाल ही में किया गया प्लास्टर भी टिक नहीं पाया और दोबारा उखड़ने लगा है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज 8वीं शताब्दी का यह किला कभी अभेद्य माना जाता था, लेकिन वर्तमान में इसकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। दुर्ग के मुख्य द्वार—सूरजपोल, चांदपोल और अन्य पोल—भी जर्जर होते नजर आ रहे हैं।
वहीं, तोपखाना भवन भी अपनी ऐतिहासिक परतों के बावजूद उपेक्षा झेल रहा है। कभी संस्कृत पाठशाला और बाद में शस्त्रागार के रूप में इस्तेमाल हुआ यह स्थल अब रखरखाव के अभाव में धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है।
इसी तरह भाद्राजून की छतरियां, जो राजपूती स्थापत्य कला और शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, वहां भी पत्थरों की घिसावट और संरचनात्मक कमजोरी दिखाई देने लगी है। बारीक नक्काशी वाले स्तंभ और गुम्बद समय के साथ क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का कहना है कि संरक्षण के प्रयास लगातार जारी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम की रफ्तार सवालों के घेरे में है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो जालोर की ये ऐतिहासिक धरोहरें और अधिक नुकसान झेल सकती हैं।