FIR में देरी और पोस्टमॉर्टम न होने पर क्लेम खारिज करना गलत:
कंज्यूमर कोर्ट का बड़ा फैसला, बीमा कंपनी को देना होगा ₹11.25 लाख
जोधपुर-राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (RSCDRC) की जोधपुर बेंच ने बीमा कंपनियों के लिए एक अहम दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि केवल तकनीकी आधार—जैसे एफआईआर दर्ज करने में देरी या पोस्टमॉर्टम न होना—के कारण बीमा क्लेम पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। आयोग ने इस मामले में टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी को मृतक के परिजनों को ₹11.25 लाख का भुगतान करने का आदेश दिया है।
आयोग के अध्यक्ष देवेंद्र कच्छवाहा, न्यायिक सदस्य सुरेंद्र सिंह और सदस्य लियाकत अली की पीठ ने जिला उपभोक्ता आयोग, प्रथम जोधपुर के 4 दिसंबर 2023 के आदेश को निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया। आयोग ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी को 15 लाख रुपए के पर्सनल एक्सीडेंट कवर का 75 प्रतिशत नॉन-स्टैंडर्ड आधार पर अदा करना होगा।
नीलगाय से टकराने पर हुआ हादसा
मामला जोधपुर जिले की शेरगढ़ तहसील के उम्मेदजी रा बास (सेतरावा) निवासी दुर्गसिंह से जुड़ा है। उन्होंने अपनी बोलेरो गाड़ी का बीमा टाटा एआईजी से करवाया था, जिसमें वाहन मालिक-चालक के लिए 15 लाख रुपए का व्यक्तिगत दुर्घटना कवर शामिल था।
23 अगस्त 2020 की रात, शेरगढ़ से सेतरावा लौटते समय अचानक सामने नीलगाय आ गई। ब्रेक लगाने के दौरान वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया, जिससे दुर्गसिंह के सिर में गंभीर चोट आई और इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
मेडिकल और पुलिस रिकॉर्ड से पुष्टि
आयोग ने पाया कि सेतरावा के सरकारी अस्पताल के रिकॉर्ड में साफ तौर पर ‘सड़क दुर्घटना में सिर की चोट’ दर्ज है। साथ ही, डॉक्टर अश्विनी उपाध्याय के पुलिस बयान (धारा 161 CrPC) में भी यह स्पष्ट किया गया कि अधिक रक्तस्राव के कारण इलाज के दौरान मौत हुई।
आयोग ने जिला आयोग के उस निष्कर्ष को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि दुर्गसिंह को मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया था। आयोग ने यह भी माना कि पोस्टमॉर्टम न होना या पुलिस रिपोर्ट में देरी होना परिवादी की गलती नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
परिवार की ओर से अधिवक्ता सचिन सारस्वत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘रवि बनाम बद्रीनारायण’ और ‘ओमप्रकाश बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस’ जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि तकनीकी आधार पर क्लेम अस्वीकार करना न्यायसंगत नहीं है।
वहीं बीमा कंपनी ने एफआईआर में 2 महीने 5 दिन की देरी का तर्क दिया, लेकिन आयोग ने गणना कर बताया कि वास्तविक देरी मात्र 40 दिन थी।
ब्याज और अतिरिक्त राशि का भी आदेश
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के अन्य निर्णयों—‘नेशनल इंश्योरेंस बनाम नितिन खंडेलवाल’ और ‘अमलेन्दु शाहू बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस’—का हवाला देते हुए कहा कि शर्तों के उल्लंघन के बावजूद पूरा क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर आयोग ने टाटा एआईजी को निर्देश दिया कि वह ₹11.25 लाख की राशि 23 फरवरी 2022 (परिवाद दायर करने की तिथि) से 9% वार्षिक साधारण ब्याज सहित अदा करे। साथ ही ₹10,000 वाद एवं अपील व्यय के रूप में भी देने होंगे।
क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला बीमा धारकों के लिए राहतभरा माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि तकनीकी खामियों के आधार पर बीमा कंपनियां उपभोक्ताओं के वैध दावों को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकतीं।