नागौर जमीन विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला:
53 साल बाद कालू खान की सनद को मिली वैधता
राजस्थान हाईकोर्ट की राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने नागौर के बहुचर्चित जमीन विवाद में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 1972 में जारी सनद को पूरी तरह वैध ठहरा दिया। कोर्ट ने जिला कलेक्टर, सेटलमेंट कमिश्नर और बीकानेर डिविजनल कमिश्नर द्वारा सनद रद्द करने के सभी आदेशों को अवैध करार देते हुए खारिज कर दिया।
यह मामला नागौर शहर के दिल्ली गेट के बाहर स्थित ‘कालू खान की बाड़ी’ की 149 बीघा जमीन से जुड़ा है, जिसकी जड़ें भारत-पाक विभाजन तक जाती हैं। विभाजन के दौरान मूल खातेदार पाकिस्तान चले गए थे, जिसके बाद जमीन को ‘एवैक्यूई प्रॉपर्टी’ घोषित कर केंद्र सरकार के मुआवजा पूल में शामिल कर लिया गया।
बाद में कालू खान को विधिवत प्रक्रिया के तहत 15 जून 1972 को यह जमीन आवंटित की गई थी। लेकिन कुछ ही महीनों में तत्कालीन कलेक्टर ने स्वतः संज्ञान लेकर इस सनद को रद्द कर दिया, जिससे कानूनी विवाद शुरू हुआ जो तीन पीढ़ियों तक चला।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि कलेक्टर खुद ही अपीलकर्ता बनकर कार्रवाई नहीं कर सकते, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। कोर्ट ने इस तर्क को सही मानते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय लिए।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब जमीन केंद्र सरकार के अधीन थी, तो राज्य सरकार को उसे किसी अन्य को आवंटित करने का अधिकार नहीं था। साथ ही, सरकार और नगर पालिका द्वारा दिए गए विरोधाभासी दावों को भी आधारहीन बताया गया।
इस फैसले के बाद कालू खान के उत्तराधिकारियों और जमीन से जुड़े सैकड़ों लोगों को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि कानून के दायरे से बाहर जाकर की गई कोई भी कार्रवाई, चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, वैध नहीं मानी जा सकती।